Thursday, June 9, 2011

चर्चित पत्रकार और लेखक दिलीप मंडल से वार्ता

दिलीप मंडल की पुस्तक 'मीडिया का अंडरवर्ल्ड' राजकमल से प्रकाशित है | इस पुस्तक में उन्होंने पेड न्यूज और मीडिया में प्रचलित अन्य दुश-प्रवतियों की पोल खोली है | यह एक आँखें खोल देने वाली किताब है | इस लिंक द्वारा इस पुस्तक को राजकमल की वेबसाइट पर देखें |

यह पुस्तक राजकमल की वेबसाइट पर उपलब्ध है  http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&Uc=15684
 
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Tuesday, June 7, 2011

'रश्मिलोक' : रामधारी सिंह दिनकर की सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ इस पुस्तक में एक साथ



रामधारी सिंह दिनकर हमारे राष्ट्र कवि हैं | दिनकर जी ने कई काव्य संग्रह लिखे, 'रेणुका' से लेकर 'हारे को हरिनाम' तक | एक पाठक के लिए दिनकर जी के सारे काव्य खंड पढना थोडा मुश्किल हो सकता है, जबकि यह जानते हुए की हर काव्य संग्रह में कुछ चुनिन्दा ही कवितायेँ ऐसी होती हैं जो पाठक के दिल और दिमाग पर घर कर जाती हैं |

इसी को ध्यान में रखते हुए राजकमल प्रकाशन समूह ने एक विशेष पुस्तक निकाली है जिसका नाम है 'रश्मिलोक' | इस पुस्तक में रामधारी सिंह दिनकर जी के पहले काव्य संग्रह 'रेणुका' से लेकर उनके आखिरी संग्रह 'हारे से हरिनाम' में से सिर्फ कुछ चुनिन्दा और प्रतिनिधि कवितायेँ इस पुस्तक में एक साथ दी गयी हैं| यह एक पुस्तक ही पाठक को दिनकर जी की सर्वश्रेष्ठ कवितायों से रूबरू करा देती है |

इस पुस्तक में 455 पृष्ठ हैं जो शुरू से आखिर तक आपको बांध कर रखेंगे | इसका मूल्य 600/- रूपये है, परन्तु 10% छूट के बाद यह आपको 540/- रूपये की मिलेगी |

आप यह पुस्तक बहुत आसानी से इन तीन तरीकों से घर बैठे मंगवा सकते हैं | (वी.पी.पी से )
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Monday, June 6, 2011

पुस्तक 'कशी का अस्सी' पर फिल्म

यह पुस्तक राजकमल की वेबसाइट पर उपलब्ध है  http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&Uc=11021
 
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Saturday, June 4, 2011

'तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं'



कुंवर नारायण हमारे समय के उन अप्रितम लेखकों में से हैं, जिन्होंने हिंदी कविता में ही नहीं बल्कि पुरे भारतीय साहित्य में अपनी एक सशक्त और अमिट पहचान बनायी है |

'तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं' पिछले एक दशक में कुंवर नारायण द्वारा विभिन्न लेखकों, कवियों, पत्रकारों को दी गयी भेंटवार्ताओं का एक प्रतिनिधि चयन है | कुछ भेंटवार्ताओं में संवाद हैं, कुछ में अपने साहित्य और समय के प्रश्नों से गहराई में जाकर जूझने की कोशिश है और कुछ में प्रश्नों के सीधे उत्तर हैं |

कुंवर नारायण हिंदी के उन चुनिन्दा लेखकों में से हैं जो साक्षात्कार विध्या को धैर्य और पर्याप्त गंभीरता से लेते हैं | यही कारन है की उनकी भेंटवार्ताओं के किसी भी चयन का महत्त्व उनकी समीक्षा पुस्तकों से कम नहीं है | उनकी कुछ लम्बी भेंटवार्ताओं उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी उनकी समीक्षाएं या विचारात्मक निभंध | 

'तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं' का संपादन विनोद भारद्वाज ने किया है जो कुंवर नारायण की प्रारंभिक भेंटवार्ताओं के संग्रह 'मेरे साक्षात्कार' का भी संपादन कर चुके हैं | पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से विनोद भारद्वाज कुंवर नारायण के निकट संपर्क में रहे हैं | वह उनके समय-समय पर कई लम्बी भेंटवार्ताओं का संयोजन भी कर चुके हैं | यह पुस्तक हिंदी में ही नहीं, भारतीय साहित्य के सभी अध्येताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी | कुंवर नारायण के जीवन और साहित्य दोनों का ही एक अच्छा परिचय इस पुस्तक में मौजूद है | 

यह पुस्तक राजकमल की वेबसाइट पर उपलब्ध है  http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&Uc=15683
 
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Thursday, June 2, 2011

दीवान-ए-ग़ालिब

 मूल्य - 250 रूपये

 साहित्य के हजारों साल लम्बे इतिहास में जिन चाँद काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्ही में से एक हैं| उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीडाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयां किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक नया अंदाज़ पाया और वही लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गया| उनकी शायरी में जीवन का हर पहलु और हर पल समाहित है, इसीलिए वह जीवन की बहुविधि और बहुरंगी दशाओं में हमारा साथ देने की शमता रखती है|

काव्यशास्त्र की दृष्टि से ग़ालिब ने स्वयं को 'गुस्ताख' कहा है, लेकिन यही उनकी खूबी बनी | उनकी शायरी में जो हलके विद्रोह का स्वर है, जिसका रिश्ता उनके आहत स्वाभिमान से ज्यादा है, उसमे कहीं शंका, कही व्यंग्य, और कहीं कल्पना की जैसी तरंगे हैं, वे उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला से ही संभव हुई हैं | इसी से उनकी ग़ज़ल प्रेम-वर्णन से बढ़कर जीवन-वर्णन तक पहुँच गयी है |

अपने विशिष्ट सौन्दर्यबोध से पैदा अनुभवों को उन्होंने जिस कलात्क्मता से शायरी में ढला, उससे न सिर्फ वर्तमान के तमाम बंधन टूटे, बल्कि वह अपने अतीत को समेटते हुए भविष्य के विस्तार में भी फैलती चली गई| निश्चय ही ग़ालिब का यह दीवान हमें उर्दू-शायरी की सर्वोपरि सीमा तक ले जाता है |

यह पुस्तक राजकमल की वेबसाइट पर उपलब्ध है http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&Uc=13665
 

Wednesday, June 1, 2011

'पाकिस्तान में युद्ध कैद के वे दिन' : 1965 भारत-पाक युद्ध

 

मूल्य - 200 रूपये (HardBound)
मूल्य - 85 रूपये (Paperback )

राजकमल की एक हटकर और रोचक पुस्तक 'पाकिस्तान में युद्ध कैद के वे दिन'| यह पुस्तक भारत सेना के ब्रिगेडियर अरुण वाजपेयी द्वारा लिखी गयी है जो उनके साथ गठी सच्ची घटना पर आधारित है|

घटना को लगभग 39 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन लेखक ने स्मृतियों के सहारे इस पुस्तक को लिखते हुए उन त्रासद लम्हों को एक बार फिर जीया है और पूरी संजीदगी के साथ अपने तल्ख़ अनुभवों का जीवंत चित्रण किया है| 1965 के भारत-पाक युद्ध में लेखक पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में सीमा रेखा के 35 किलोमीटर भीतर युद्ध कैदी बने और भारतीय सेना के दस्तावेजों में लगभग एक वर्ष तक लापता ही घोषित रहे | एक दुश्मन देश में एक वर्ष की अवधि युद्ध कैदी के रूप में बिताना कितन त्रासद और साहसिक कार्य था तथा वहां उन्हें किन-किन समस्याओं से निपटना पड़ा, इन सबकी तल्ख़ जानकारी इस किताब में पाठकों को मिलेगी|

यह किताब संशय और आशंकाओं से शुरू होती है तथा उम्मीद और आस्था की ओर बदती है जो पाठकों को बेहद रोमांचित करेगी |

 
यह पुस्तक राजकमल की वेबसाइट पर उपलब्ध है http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&Uc=12801